महराजगंज।आज महराजगंज के गांधी नगर वार्ड नंबर 6 में श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन ब्यास पीठाधीश्वर श्री अच्युतानंद मिश्र जी द्वारा महराज परिक्षित की कथा सुनाते हुए कहा कि इस कलयुग का प्रभाव कुछ ऐसा हुआ कि महराज परिक्षित वन में शिकार खेलने गए हुए थे उस समय शिकार करते हुए काफी समय बीत जाने के कारण महाराज परिक्षित को भूख प्यास सताने लगी महाराज परिक्षित वन में जल की तलाश करते हुए एक महर्षि के आश्रम पर पहुंचते हैं वहां ऋषि ध्यान में मग्न थे महराज परिक्षित ने उसी ध्यान मग्न में बैठे हुए श्रृषि से जल मांगने लगे परन्तु ऋषि ध्यान में मग्न के कारण उनकी आवाज न सुन सके जिससे महाराज परिक्षित ऋषि पर कुपित हो उनके गले में एक मरा हुआ सर्प लपेट कर वहां से चले गए कुछ देर बाद उस ऋषि के पुत्र आश्रम पर आये और अपने पिता के गले में मरे हुए सर्प को देखकर उन्होंने महाराज परिक्षित को श्राप दिया कि हे परिक्षित जिस सर्प को तुम मेरे पिता के गले में लपेट कर गये हो यही सर्प आजके सातवें रोज तुम्हें सर्पदंश कर तुम्हें मार डालेगा ज्यों ही ऋषि पुत्र ने श्राप दिया तब तक उनके पिता ध्यान से उठ गए बाद में पिता ने पुत्र से पुछा क्या हुआ जिसके बाद पुत्र ने सभी घटित घटनाओं को एवं अपने द्वारा दिए हुए श्राप को बताया इस पर ऋषि ने अपने पुत्र को ही समझाते हुए कहा कि जिसके राज्य का राजा नहीं रहता वहां चोर डाकुओं का राज हो जाता है और लोग एक-दूसरे को सताने लगते हैं तुमने ग़लत किया है महाराज परिक्षित को तुम्हें श्राप नहीं देना चाहिए था ऋषि अपने पुत्र को लेकर दुसरे दिन राजा परीक्षित के पास गये और अपने पुत्र के कृत्य पर क्षमा मांगी और उस श्राप से मुक्ति का उपाय भी बताए यही से महाराज शुकदेव यही श्रीमद्भागवत कथा महाराज परिक्षित को सुनाना प्रारम्भ किया।